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Hare Krsna,

Please accept my humble obeisances. All glories to Srila Prabhupada & Srila Gopal Krishna Maharaj.

भगवान की कामना- इस लेख का यह शीर्षक कुछ अजीब नही है? भगवान जो समस्त ब्रह्मांडों के तथा षड ऐश्वर्यों के पूर्णतम स्वामी हैं, क्या कोई कामना की इच्छा रखेंगे? लेकिन यह सच है | वे शुद्ध भक्तों की चरण-कमलों की धूल की कामना करते है ताकि उस धूल से अपने को पवित्र कर सके | वही भगवान, जिनका नाम ही इतना पवित्र है, लेने वाले भक्तों के हृदय की जन्मों की मैल को साफ़ कर देता है | 

शुद्ध भक्त जिसने भगवान को पूरी तरह समर्पण कर दिया है, भगवान पर पूरी तरह आश्रित रहता हैं तथा किसी भी परिस्थिति में अपने विश्वास को डगमगाने नही देता | वह सदा और सर्वदा (प्रत्येक परिस्थिति) में भगवान का स्मरण नही छोड़ता और हमेशा उनके पवित्र नाम का कीर्तन करता रहता है |

भक्त शिरोमणि प्रह्लाद का ही उदाहरण लीजिये | हिरण्यकशिपू ने पांच वर्षीय प्रह्लाद को जो उसका पुत्र था, मरवाने के लिए सभी प्रकार के उपाय किये | हाथी के पैरों तलों कुचलवाया,पहाड़ से नीचे फिकवाया, कढ़ाई में उबलते तेल में डाल दिया तथा जलती अग्नि में अपनी बहन (जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था ) की गोद में बैठा दिया | किसी भी परिस्थिति में प्रह्लाद ने कभी भी भगवान् को अपने लिए नही पुकारा, पर भगवान् को हमेशा स्मरण करते रहे | इसी प्रकार हरिदास ठाकुर जो एक मुसलमान थे, का हरि नाम जप छुटाने के लिए बाईस बाजारों में बैंतों से बहुत बुरी तरह से पीटा गया लेकिन वे फिर भी हरि नाम कीर्तन करते रहे तथा पीटने वाले खादिमों को माफ़ कर दिया | लेकिन भगवान को अपने लिए नही पुकारा |

भगवान ने प्रह्लाद को वर मागने को कहा, लेकिन प्रह्लाद प्रहलाद महाराज प्रार्थना करते हैं कि “मेरे हृदय में किसी प्रकार की कामनायें न रहें” | इसी प्रकार भगवान जब ध्रुव की तपस्या से प्रसन्न हो कर, वर देने के लिए प्रकट हुए तो ध्रुव कहतें हैं कि उनकी अब कोई इच्छा नही है | उलटे उन्हें दुख होता है कि उन्होंने भौतिक कामनाओं के लिए तपस्या की |

भगवान चाहते हैं कि वे ऐसे शुद्ध भक्तों की इच्छायें पूरी कर सुख पायें, लेकिन भक्त तो निष्कंचन होता है और जन्म जन्मान्तर बस भगवान की अहैतुकी भक्ति करते रहना चाहता है | वह तो भव-बन्धन से भी मुक्त नही होना चाहता, जबकि मुक्ति तो भक्त के समक्ष उसकी सेवा करने के लिए हाथ जोड़े खड़ी रहती है | कृष्ण उद्धव से कहते हैं: “मेरे भक्त मेरे अतिरिक्त कुछ भी नहीं चाहते, सच तो यह है कि यदि मैं उन्हें जन्म-मृत्यु से मुक्ति भी प्रदान करता हूँ तो वे इसे स्वीकार नहीं करते” (SB.11.20.34) |

भक्तों में आत्मसुख अर्थात अपने सुख की भावना बिलकुल भी नही होती, उनके जीवन की एकमात्र और केवल एकमात्र इच्छा है कृष्ण को सुख देना | इसलिए भगवान ऐसे भक्तों के आधीन हो जाते हैं और उनके सदैव ऋणी रहते हैं | अहैतुकी भक्ति का मतलब है बिना किसी हेतु के अर्थात बिना किसी कामना के भगवान पर पूरी तरह से आश्रित हो कर प्रत्येक परिस्थिति में भगवान को प्रसन्न करने के उद्देश्य से की गई भक्ति |

हम सब के जीवन का भी यही परम लक्ष्य होना चाहिए |

हरे कृष्णा

दण्डवत

आपका विनीत सेवक

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Comment

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Comment by Prabhu Premi_Ankul on September 29, 2014 at 3:11pm

Jai Siya Ram Prabhu, 

Thank you so much for such writ up, all glad to read about Bhakti leela and ishwara Prem, May you and your entire Kula attain the dust of lotus feel of Sri Bhagwan, and spread the message of Peace, Love, selfishness and Ishwara Bhakti to Humankind.

May we all get such divine inspiration to do the direct or indirect service of godhead to serve the purpose of our life to make it beautiful by in the divine service.

-- 

Ankul

~Siya Ram Sarvada Jaya~

Comment by Bhuwan Dutt Bawari on September 29, 2014 at 11:49am

Hari Bol!!!!!!!!!!!!! Prabhuji What a great expanation!!!!!!!!!!!!! very nice Radhey! Radhey!

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