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भक्त प्रह्लाद द्वारा अपने सहपाठियो को भागवत धर्म का उपदेश

Hare Krsna,

Please accept my humble obeisance. All glories to Srila Prabhupada & Srila Gopal Krishna Maharaj.

भक्त शिरोमणि प्रह्लाद ने अपने दैत्य सहपाठियों को जीवन का परम लक्ष्य भक्ति-योग तथा भागवत धर्म का सरल वर्णन किया जिसे समझ कर एक बद्ध जीवात्मा भी भगवद्-धाम वापस जा सके (स्कन्द 7: अध्याय 6-7) :

प्रह्लाद महाराज कहते हैं: बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह जीवन के प्रारम्भ से ही अन्य सारे कार्यो को छोड़ कर भक्ति-कार्यो के अभ्यास में इस मानव शरीर का उपयोग करे | यह मनुष्य शरीर अत्यंत दुर्लभ है और अन्य शरीरो की भांति नाशवान होते हुए भी अर्थपूर्ण है, क्योकिं मनुष्य जीवन में ही भक्ति संपन्न की जा सकती है (6.1) | यह मनुष्य जीवन भगवद्धाम जाने का अवसर प्रदान करता है, अतैव प्रत्येक जीव को भगवान् विष्णु के चरण-कमलों की भक्ति में प्रवृत होना चाहिए (6.2) | शरीर के सम्पर्क से इन्द्रियविषयों से जो सुख अनुभव किया जाता है, वह तो किसी भी योनी में उपलब्ध है | ऐसा सुख बिना प्रयास के उसी तरह स्वतः प्राप्त होता है, जिस प्रकार हमें दुख प्राप्त होता है (6.3) | केवल इन्द्रिय तृप्ति के लिए प्रयत्न नहीं करना चाहिए क्योकि इसमें आयु की हानि होती है | अतैव इस संसार में रहते हुए बुद्धिमान मनुष्य को जब तक शरीर हष्ट-पुष्ट रहे, जीवन के परम लक्ष्य, भव-बंधन से मुक्ति के लिए प्रयास करना चाहिये (6.4-5) |  

जिसके मन तथा इन्द्रियाँ वश में नहीं हैं, वह भौतिक जगत को भोगने की इच्छा से पारिवारिक जीवन में अधिकाधिक आसक्त होता जाता है और इस तरह पागलपन में अपने जीवन को व्यर्थ बिता देता है (6.8) | ऐसा कौन मनुष्य होगा जो अपनी इन्द्रियों को वश में करने में असमर्थ होने के कारण गृहस्थ जीवन से अत्याधिक आसक्त रह कर अपने आप को मुक्त कर सके? (6.9) | ऐसा कौन होगा जो गृहस्थ जीवन में धन संग्रह करने की तृष्णा का परित्याग कर सके, जिसे वह अपने प्राणों की बाजी लगा कर भी प्राप्त करने का प्रयास करता है ? (6.10) | अत्याधिक आसक्त गृहस्थ उस रेशम-कीट की तरह है, जो अपने चारों और धागा बन कर अपने आप को बंदी बना लेता है और फिर उससे निकल पाने में असमर्थ रहता हैं | केवल दो इन्द्रियों, कामिन्द्रिय तथा जिव्हा की तुष्टि के लिए मनुष्य अत्याधिक मोह में बंध जाता है (6.13) | वह यह नहीं समझता कि वह अपनी बहुमूल्य आयु अपने परिवार के पालन-पोषण में व्यर्थ बिता रहा है तथा इस मानव जीवन का परम हित विनष्ट हुआ जा रहा है (6.14) |

इस भौतिक जगत में विद्वान व्यक्ति भी अपने परिवार को जीवन की सुविधाएँ प्रदान करने में लगे रहते हैं | वे आध्यात्मिक ज्ञान ग्रहण नहीं कर पाते तथा शिक्षा-रहित व्यक्ति या पशु जैसा व्यवहार करते हैं (6.16) | यह निश्चित है कि भगवान् के ज्ञान से विहीन कोई भी अपने को किसी काल या देश में मुक्त करने में समर्थ नहीं रहा है | निसन्देह, ऐसे लोग सुन्दर स्त्रियोँ के हाथ के खिलोने बने रहते हैं और इस तरह वे भव-बन्धन की जंजीरों से जकड़े रहते हैं | ऐसे व्यक्तियों से दूर रहो और पूर्ण-पुरुषोत्तम नारायण की शरण ग्रहण करो जो समस्त देवताओं के उदगम हैं, नारायण-भक्तों का चरम लक्ष्य भव-बन्धन से मुक्ति पाना है (6.17-18) |

पूर्ण-पुरुषोत्तम नारायण ही समस्त जीवों के पिता तथा आदि परमात्मा है, जो जीवन के विभिन्न रूपों यथा पोधें जैसे स्थावर जीवों से ले कर प्रथम जीव ब्रह्मा तक में उपस्थित हैं | एक होकर भी वे सर्वत्र उपस्थित रहते हैं तथा परम सच्चिदानन्द के रूप में अनुभव किये जाते हैं | अतैव तुम सब ऐसा करो कि वे तुम पर प्रसन्न हों | सभी जीवों में भक्ति जगा कर उन पर दया प्रदर्शित करो और इस प्रकार उनके हितेषी बनो (6.19-24) | जिन भक्तों ने समस्त कारणों के कारण पूर्ण-पुरुषोत्तम भगवान् को प्रसन्न कर लिया है उनके लिए कुछ भी अलभ्य नहीं है | हम भक्तगण सदैव भगवान् के चरण-कमलों का यशोगान करते हैं अतैव हमें धर्म, अर्थ, काम, तथा मोक्ष की याचना नहीं करनी चाहिए (6.25) | मैंने यह ज्ञान भक्ति में सदैव तल्लीन परम सन्त नारद से प्राप्त किया है तथा यह ज्ञान भागवत धर्म कहलाता है (6.28) |

प्रह्लाद कहते हैं: हे मित्रों, यदि तुम मेरी बातों पर श्रद्धा करो, तो तुम भी उसी श्रद्धा से मेरे ही समान दिव्य ज्ञान को समझ सकते हो | इसी प्रकार एक स्त्री भी दिव्य ज्ञान को समझ सकती है और यह जान सकती है कि आत्मा क्या है तथा भौतिक पदार्थ क्या है (7.17) | दूषित बुद्धि के कारण मनुष्य को प्रकृति के गुणों के अधीन रहना पड़ता है और इस प्रकार वह भव-बंधन में पड जाता है | इस संसार को जिसका कारण अज्ञान है, अवांछित तथा नश्वर मानना चाहिए (7.27) | अतएव तुम्हारा कर्तव्य है कि परमेश्वर से जुड़ने की विधि ग्रहण करो जो भौतिक प्रकृति के तीन गुणों द्वारा उत्पन्न सकाम कर्मों के बीज को जला सकता है (7.28) | भौतिक जीवन से छूटने की विधि है ऐसे कर्तव्यों को संपन्न किया जाना जिससे परमेश्वर के प्रति प्रेम विकसित होता है (7.29) |

प्रह्लाद अपने सहपाठियो को समझाते हैं: हे मित्रों, मनुष्य को प्रमाणिक गुरु स्वीकार करना चाहिए और संत पुरुषो तथा भक्तों की संगति में भगवान् की पूजा, श्रद्धापूर्वक भगवान् के यश का श्रवण, भगवान् के दिव्य गुणों तथा कार्यकलापों का यशोगान, सदैव भगवान् के चरण-कमलो का ध्यान तथा भगवान् के अर्चाविग्रह की पूजा करनी चाहिए (7.30-31) | भगवान् प्रत्येक जीव के अंत:करण में स्थित है, इस प्रकार उसे प्रत्येक जीव का आदर करना चाहिए | ऐसा कर लेने पर वह पूर्ण पुरुषोत्तम को निश्चित रूप से प्राप्त कर लेता है (7.32-33) | निरन्तर भगवान् की लीलाओं के विषय में मनन करते रहने से भक्त का मन तथा शरीर सारे भौतिक कल्मष से मुक्त हो जाता है, उसकी समस्त भौतिक इच्छाएँ पूर्णतया भस्म हो जाती हैं (7.36) | जीवन की असली समस्या जन्म-मृत्यु का चक्र है, जो पहिये की भांति चलता रहता है किन्तु जब कोई पूर्ण पुरुषोत्तम की शरण में रहता है तो यह चक्र पूरी तरह रूक जाता है (7.37) |   

हे मित्रों, सब जीवों के सुभचिन्तक तथा मित्र भगवान्, परमात्मा रूप में सबके अन्तःकरण में विद्यमान रहते हैं | भगवान् की पूजा करने में कोई कठिनाई भी नही है, तो फिर लोग उनकी भक्ति क्यों नही करते? वे इन्द्रिय तृप्ति में व्यर्थ ही क्यों लिप्त रहते हैं (7.37) | सारे स्वर्गलोक भी नश्वर हैं, अतएव ये भी जीवन के लक्ष्य नही है (7.40) | प्रत्येक व्यक्ति सुख का इच्छुक रहता है और अपने दुख कम करना चाहता है | किन्तु वास्तव में कोई तभी तक सुखी रहता है जब तक वह सुख के लिए प्रयत्नशील नही होता | ज्योंही वह सुख के लिए कार्य प्रारम्भ करता है त्योंही दुख की अवस्था प्रारम्भ हो जाती है (7.42) | जीव को सारे सकाम कर्म दुख तथा कष्ट प्रदान करने वाले हैं (7.46) | 

अतः हे मित्रों, बिना किसी प्रकार की इच्छा किये, परमेश्वर पर आश्रित रह कर भक्तिपूर्वक परमात्मा की पूजा करो (7.48) | दान, तपस्या, यज्ञ, या व्रतों से कोई भगवान् को प्रसन्न नही कर सकता है ,भगवान् तो तभी प्रसन्न होते हैं जब मनुष्य अविचल अनन्य भक्ति करता है (7.52) | इस भौतिक जगत में समस्त कारणों के कारण गोविंद के चरण-कमलों के प्रति सेवा और सर्वत्र उनका दर्शन करना ही मनुष्य जीवन का एकमात्र लक्ष्य है (7.55) |

हरे कृष्णा

दण्डवत

आपका विनीत सेवक

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