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भगवान कृष्ण की भक्ति-वत्सलता:

Hare Krsna, Please accept my humble obeisance. All glories to Srila Prabhupada & Srila Gopal Krishna Maharaj.

भक्त, भगवान् कृष्ण के ह्रदय में उसी तरह रहते हैं जैसे कंजूस के ह्रदय में धन | भक्ति भगवान् से भी बड़ी है क्योंकि यह भगवान् को आकर्षित करती है | भगवान् अपने बड़े से बड़े वर को तुच्छ मानते है, किन्तु अपने भक्त द्वारा की गई तुच्छ सेवा को बहुत बड़ा मानते हैं (SB.10.81.35) | भगवान् कृष्ण की प्रकृति ही है, कृपा करना | वे भक्तों के अपराध को नजरअन्दाज कर देतें हैं, लेकिन उनकी छोटी से सेवा को भी कभी नही भूलते |

गोकुल में एक फल बेचने वाली आई | कृष्ण अपनी नन्ही हथेलियों में अनाज लेकर तेजी से फल बेचने वाली के पास पहुचे लेकिन उनकी अंजुलीयों में अनाज के केवल कुछ दाने ही बचे | फिर भी फलवाली ने उनके दोनों हाथों को फल से भर दिया | उधर उसकी फल की टोकरी तुरंत रत्नों तथा सोने से भर गयी (SB.10.11.10-11) | दामोदर लीला में अपनी माता यशोदा के प्रेम में बालक कृष्ण ने अपने को अर्पित कर दिया और दण्डस्वरूप अपने को रस्सी से बँधवा लिया तथा भक्तों के द्वारा अपनी पराजय के भाव को प्रकाशित किया | बकासुर की बहन पूतना अपने स्तनों में घातक विष का लेप करके और स्तनपान करा कर कृष्ण को मारना चाहती थी फिर भी भगवान् कृष्ण ने उसे अपनी माता के योग्य गति प्रदान की (SB. 3.2.23) |

एक कुबड़ी युवती कुब्जा जो कंस की दासी थी, प्रतिदिन कंस के लिए चन्दन का लेप ले जाती थी | जब उसने कृष्ण को मथुरा भ्रमण करते समय देखा तो उनकी सुन्दरता बढाने के लिए उसने उनके शरीर पर चन्दन लेप कर दिया | उसकी इस छोटी सी सेवा के बदले कृष्ण ने उसको सीधा कर तुरंत ही उसको एक सुन्दर युवती बना दिया तथा बाद में उसके घर जाकर उसकी इच्छा पूरी की |           

भगवान् कृष्ण ने एक हाथ में चाबुक तथा दुसरे में घोड़ों की लगाम पकड़ कर अर्जुन के लिए सारथि का कार्य किया तथा पांडवो के दूत के रूप में धृतराष्ट्र के दरबार में पांडवो के लिए 5 गाँव मांगने गये | वहशी दु:शासन ने कुरु सभा में महारानी द्रोपदी को निर्वस्त्र करने का अथक प्रयास किया, किन्तु कृष्ण ने द्रोपदी के तन को ढकते हुए उसकी साड़ी को असिमित मात्रा में इतना बढ़ा दिया कि हजारो हाथियों का बल रखने वाला दु:शासन थक कर चूर हो गया और सभासदों की वासनाभरी आँखे द्रोपदी का स्पर्श नहीं कर सकी |

रामचन्द्र जी के रूप में, अपनी भक्त शबरी के झूठे फल खाये | इसी प्रकार वृन्दावन में जब भगवान् कृष्ण, गाय व बछड़े चराते समय, जब अपने गोप सखाओं के साथ खेलते थे तो वे हारने पर वे उन्हें अपनी पीठ पर सवारी कराते थे | उनका झूठा खाना खा लेते थे | जब सुदामा द्वारिका पहुचे तो भगवान् ने दौड़ कर उनका स्वागत किया, उन्हें गले लगाया, उनके चरण पखारे तथा उस जल को अपने सिर पर छिड़का तथा उन्हें अपने बिस्तर पर सुलाया, और उनकी भलीभांति सेवा की | सुदामा द्वारा लाये गए थोड़े से सूखे चावल खा कर, बिना मांगे ही उनको इन्द्र के तुल्य सम्पति दी | भगवान् सुदामा से कहते हैं: यदि कोई मुझे प्रेम तथा भक्ति के साथ एक पत्ती, फूल, फल या जल अर्पित करता है, तो मैं उसे स्वीकार करता हूँ (SB.10.81.4) | यही शब्द उन्होंने भगवद् गीता (9.6) में भी कहें हैं |

भगवान् कृष्ण अपने भक्तों के प्रीति इतने दयालु हैं कि वे अपने दिये गये वचन को तोड़ सकते हैं, लेकिन भक्तों के दिये गये वचन को झूठा नहीं होने देते | कुरुक्षेत्र के युद्ध शुरू होने से पहले ही, वे शास्त्र नहीं उठाने की घोषणा कर चुके थे | लेकिन एक दिन भीष्म पितामह ने दुर्योधन को वचन दिया कि वो आज कृष्ण को हथियार उठाने पर मजबूर कर देगे और इतना भीषण युद्ध किया कि भगवान् कृष्ण पांडवो की रक्षा में रथ का पहिया उठा कर भीष्म की तरफ दोड़े तथा अपना वचन तोड़ दिया | हिरण्यकशिपू के पूछने पर प्रह्लाद महाराज ने कहा: हाँ इस खम्बे में भगवान् हैं, तो भगवान् भक्त के वचन को सत्य करते हुए तुरंत खम्बे से नृसिंह के रूप में प्रकट हो गये | हिरण्यकशिपू के मारे जाने पर, प्रह्लाद भगवान् नृसिंह की प्रार्थना करते हुए कहते हैं: “मुझे बचाने तथा उन्हें मारने- दोनों ही कार्यों में आपने अपने भक्त के वचनों को सत्य करने के लिए ही कर्म किया है” (SB.7.9.29) | इसीलिए कृष्ण खुद कहने के बजाय, अर्जुन से कहते हैं : हे कुंतीपुत्र ! निडर होकर घोषणा करदो कि मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता है (BG.9.31) | निर्दोष भक्त की रक्षा सदैव भगवान् द्वारा की जाती है और पापी व्यक्ति को अपने पापमय जीवन के लिए दण्ड दिया जाता है (SB.10.7.31) |

अपने एक ब्राह्मण भक्त के वचन की सत्यता सिद्ध करने के लिए अपने गोपाल विग्रह के रूप में भक्त के पीछे-पीछे वृन्दावन से विद्यानगर (उडीशा) गए तथा अब साक्षी गोपाल के रूप में जगन्नाथ धाम के निकट पूजे जाते हैं | बालासोर के पास श्री गोपीनाथ मंदिर में, भक्त माधवेन्द्र पुरी के लिए खीर का एक पात्र चुराकर दिया, इसलिए खीर-चोरा गोपीनाथ कहलाये | अजामिल ने मृत्यु के समय यमदूतो को देख कर भय तथा घबरा कर अपने पुत्र नारायण को पुकारा लेकिन भगवान् ने उसको अपना नाम समझा और तुरन्त ही बिष्णु दूतो को उसका उद्धार करने के लिए भेज दिया | इसी प्रकार वाल्मीकि जी ने “मरा मरा” का जाप किया, लेकिन उनको भगवान् के नाम  “राम राम” के जाप का फल मिला |

षड-एश्वर्य पूर्ण भगवान् अपने धाम में नित्य नयी नयी नूतन लीला कर अनगनित भक्तों के साथ आनन्द बांटते हैं | लेकिन हम बद्धजीव,भगवान् से अपने सम्बन्ध को भूल कर सुख भोगने व पाने के प्रयास में हमेशा किसी न किसी की सेवा में लगे रहते हैं क्योंकि मन का प्राकर्तिक कार्य सेवा करना है | तथा मायाजनित इन काल्पनिक सुखों के प्रयास में अपने कर्म-फलों द्वारा प्राप्त शरीरों में हम सब इस भौतिक जगत रुपी कारागार में, कष्ट पर कष्ट झेलते रहते हैं | भगवान् हमारी दयनीय हालत देख कर दुखी होते हैं क्योंकि भगवान् हम सब जीवों के बीजदाता पिता हैं | आप भी कल्पना करें कि यदि आपका पुत्र एक कारागार में बंद हो कर, सजा काट रहा हो तो क्या आप दुखी नही होंगे तथा उससे मिलने नही आयेंगे | और वह जल्दी से जल्दी कारागार से मुक्त हो कर अपने घर वापस आजाये ऐसा प्रयास नही करेंगे | भगवान् भी यही चाहते हैं कि हम बद्धजीव इस भौतिक  कारागार तथा इन कष्टों से मुक्त हो कर भगवद्-धाम वापस आकर उनके साथ शाश्वत आनन्द का उपभोग करें | इसलिए वे अपने पार्षदों को तथा शुद्ध भक्तों को इस धरा पर भेजते हैं जो हमें हमारी वास्तविक स्थिति का अनुभव कराते हैं तथा हमें जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य भगवत्प्रेम प्राप्त करने तथा भगवद्-धाम वापस जाने के लिए रास्ता दिखाते हैं | भगवान् स्वयं भी इस धरा पर ब्रजधाम में अवतरित हो कर अपने साथियों के साथ ऐसी ऐसी सुन्दर व मधुर लीलाएं करते हैं ताकि हम भी उस प्रेम को पामे के लिए लालायित हों | भगवान् हमारे कल्याण के लिए तथा हमारे मार्गदर्शन के लिए श्रीमद् भागवतम उपलब्ध कराते हैं और स्वयं भगवद् गीता के माध्यम से ऐसा दिव्य ज्ञान प्रदान करते हैं जिसे समझ व पालन कर हम इस भवसागर को आसानी से पार कर सके तथा वर्तमान जीवन की समाप्ति पर वापस भगवद-धाम जाकर अपने आध्यात्मिक स्वरुप को पाकर भगवान् की दिव्य सेवा में अपने आप को समर्पित कर सकें |

भगवान् के शाश्वत धाम में काल का प्रवाह नहीं है इसलिए न वहाँ बुढ़ापा है, न ही बीमारियाँ हैं, न ही मृत्यु है और न ही कोई दुख है; है तो केवल भगवान् के साथ शाश्वत आनन्द में हिस्सा | यदि हम बद्ध जीव फिर भी सही रास्ते पर नही चलते अर्थात जन्म-मृत्यु के चक्र से बाहर निकलने के प्रयास नही करते तो भगवान् कृष्ण इतने दयालु हैं कि वो जीव की प्रत्येक योनी में, हृदय में आत्मा के सखा के रूप में हमेशा साथ रहते हैं, चाहे हम मनुष्य योनी में हैं या मल के कीड़े की योनी में | जब जीवात्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में देहान्तर करता है तो भगवान् जो उसके चिर सखा है, उस नए शरीर के हृदय में भी उसके साथ विराजमान रह कर उसके वापस अपने घर आने में उसकी मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं |

भगवान् कृष्ण इतने कृपालू हैं कि वे मन से की गई सेवा को भी स्वीकार कर लेते हैं | एक ब्राह्मण ने भगवान् को प्रसन्न करने के लिए मन ही मन में खीर बनायी | उसने  गाय के शुद्ध दूध में सुगन्धित चावलों की खीर तैयार की तथा उसमे बादाम,काजू, अन्य मेवें तथा गाय का घी भी डाला | फिर उसने खीर को एक कटोरी में डाल कर भगवान् को भोग अर्पित किया | उसे लगा की खीर अधिक गर्म है, तो उसने अपनी अँगुली डाल कर देखा | उसकी अँगुली जल गई तो उसने तुरन्त अँगुली को वापस खीच लिया | भगवान् ने उस ब्राह्मण की इस सेवा से प्रसन्न हो कर तुरन्त उसे अपने धाम में बुला लिया |

श्रीमद् भागवतम में भगवान् दुर्वाषा ऋषि से कहते हैं “मै पूर्णतः अपने भक्तों के नियंत्रण में हूँ, मै बिलकुल भी स्वतंत्र नहीं हूँ | चूँकि मेरे भक्त भौतिक इच्छाओ से मुक्त होते हैं, अतैव मै उनके हृदय में ही निवास करता हूँ | मेरे भक्त ही नहीं, मेरे भक्तों के भक्त भी मुझे अत्यन्त प्रिय हैं | जिस प्रकार सती स्त्रियाँ अपने पतियों को अपनी सेवा से अपने वश में कर लेती हैं, उसी प्रकार शुद्ध भक्तगण मुझ को पूरी तरह अपने वश में कर लेते हैं | शुद्ध भक्त सदैव मेरे हृदय में रहता है और मैं शुद्ध भक्तों के हृदय में सदैव रहता हूँ | मेरे भक्त मेरे सिवाय और कुछ नहीं जानते और मै उनके अतिरिक्त और किसी को नहीं जानता (SB.9.4.63,66 & 68) | भक्त होना भगवान् कृष्ण की समता से बढ़ कर है क्योंकि भक्तगण, भगवान् कृष्ण को अपने से भी अधिक प्रिय हैं (CC.आदि लीला 6.100) | कृष्ण अपने भक्तों को अपने से भी बढकर मानते हैं और कहते हैं: हे उद्धव तुम्हारे समान मुझे न तो ब्रह्मा, न शिव, न संकर्षण, न लक्ष्मी, न स्वयं मैं ही प्रिय हूँ (SB.11.14.15) |

श्रीकृष्ण गीता (9.29) में अपनी भक्त-वत्सलता का परिचय यह कह कर करते हैं: “मैं न तो किसी से द्वेष करता हूँ, न ही किसी के साथ पक्षपात करता हूँ | मैं सबों के लिए समभाव हूँ | किन्तु जो भी भक्तिपूर्वक मेरी सेवा करता है, वह मेरा मित्र है, मुझमें स्थित रहता है  और मैं भी उसका मित्र हूँ” | श्री शुकदेव गोस्वामी कहते है: “शिवजी, ब्रह्माजी, तथा इन्द्र जैसे उच्चस्थ देवताओ समैत यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भगवान् के वश में हैं, फिर भी भगवान् का एक दिव्य गुण यह है कि वे अपने भक्तों के वश में हो जाते हैं” (SB.10.9.19) |

हरे कृष्णा,

 

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